-किसी बुद्ध की तलाश में -रामजी प्रसाद " भैरव " ललित निबन्ध
चलिए थोड़ा आगे तक घूम आएं हम लोग , हमारे धर्म ग्रन्थों में शरद पूर्णिमा को लेकर यह बात आती है कि उस दिन अमृत बरसता है , इसलिए लोग खीर बनाकर खुले में रख देते हैं कि उसमें अमृत की कुछ बूदें पड़ जायें , जिसके सेवन से मनुष्य निरोग और स्वस्थ्य रहें । वह दीर्घायु हो । यह परम्परा अति प्राचीन ही प्रतीत होती है । जिसे लोग आज भी करते आ रहे हैं । यह बात दीगर है कि मनुष्य जितना ही प्रकृति से दूर होता गया , वह र

रामजी प्रसाद "भैरव"
3:16 PM, Feb 1, 2026
सुजाता जाने किसकी प्रेयसी थी , प्रेम से भरी हुई , विश्वास के कोटरों से झांकती हुई , अपने प्रिय के पैरों के स्पंदन को महसूस करती हुई , उज्ज्वला से नहाई हुई टटकी किरणों में स्नान करती हुई , निराशा के झनकार से स्वयं को विश्वास दिलाती हुई , विरह के नाले को बिखेरती हुई , हाथों में क्षीरोधन का पात्र लिए , उसी पथ को निहार रही है , जिस पथ से उसका प्रिय रोज आता था मिलने , पर आज क्यों नहीं आया । उसे अब तक आ जाना चाहिए था । उसे पता तो था कि मैं आज भी आऊँगी । जैसे कल आयी थी , सबसे छिपते - छिपाते । क्या उसे भागती हुई रजनी की व्यथा का बोध नहीं । क्या उसे पता नहीं आज चन्द्र अपनी सम्पूर्ण कलाओं से युक्त हो आभा बिखेर रहा है । आज शरद पूर्णिमा है । आकाश ऋषियों के हृदय सा स्वच्छ है । तारे अगणित दीप जलाकर उसका स्वागत कर रहे हैं । क्या उसे तनिक भी आभास नहीं कि प्रतीक्षा किसी के लिए शूल सा चुभ रहा होगा । क्या मेरा प्रेम इतना कच्चा है । सोचते सोचते उसकी आंखें निर्झरणी सी बह उठी । प्रभात होने में अब कुछ समय ही शेष हैं । निशा चन्द्र की कारगुजारियों से तंग होकर कैसे पैर पटक कर भागी जा रही है , मुझे भी जाना होगा , तुमने छल किया प्रिय , अब नहीं आऊँगी , कभी नहीं आऊँगी , मग़र ये खीर , इसका क्या करूँ , कितने मन से बनाया था तुम्हारे लिए , इसे फेंक भी तो नहीं सकती। रात भर चन्द्र किरणों में डूब कर यह अमृत हो गया है । अमृत फेंका नहीं जाता । अमृत का पान कराया जाता है । यह तुम्हारे लिए था प्रिय , लेकिन इसे फेकूँगी नहीं , पर समझ भी नहीं पा रही हूँ करूँ क्या इसका । सुजाता लौट पड़ी । निशा जा चुकी थी । भोर आलस्य छोड़ , प्रभात को जगाने चला गया । अचानक सुजाता की दृष्टि एक साधक पर पड़ी । वह एक अश्वत्थ के बृक्ष के नीचे बैठा जाने कब से साधना कर रहा था , पिंजर मात्र ही तो बचा था । अचानक उसे सूझा क्यों न यह खीर इस साधक को खिला दे । वह व्यग्र मन से वहीं बैठ गयी । निहारने लगी । एक तरफ यह साधक है जिसे मेरे आने की आहट तक नहीं सुनाई दी । एक वो है जो मुझसे वादा करके भी नहीं आया । वह खीर का पात्र वहीं रखकर चली गयी । बुद्ध जब साधना से जागे , लगा जैसे अब प्राण अब निकल जाना चाहते हैं । तीब्र क्षुधा , जो अब से पहले कभी नहीं जगी थी , आज प्राण हन्ता न बन जाय । लक्ष्य तक पहुँचने के लिए शरीर की सुरक्षा आवश्यक है । बुद्ध ने खीर खा लिया । वह केवल खीर नहीं था । वह किसी की भेंट थी । अमृत की भेंट । उन्हें बोध हुआ , सुजाता का खीर खाकर हुआ । अब यह बात यही समाप्त करता हूँ । दरअसल मुझे बात न बुद्ध की बात करनी है , न सुजाता की , न खीर की । मुझे तो बात करनी है , उस चटख चाँदनी की , जिसे शरद पूर्णिमा कहा जाता है । ऊपर मैंने पहले ही बता दिया है कि शरद पूर्णिमा है क्या । हमारे शास्त्रों में शरद को बड़ा महत्व दिया गया । अब विचार करने वाली बात यह है कि आखिर शरद में ऐसा क्या है कि , मनुष्य आयु की गणना का प्रथम माध्यम बना । स्मरण होगा आप को जीवेत शरदः शतं की बात कही गयी है । अर्थात आप सौ शरद तक जिएं । मेरे मन में कभी आता था , सौ ग्रीष्म क्यों नहीं , सौ शिशिर क्यों नहीं , सौ शरद ही क्यों । क्या आप के मन ये बातें नहीं आती हैं । मेरा विचार है जरूर आती होंगी । खैर , शरद जाड़े के मौसम को कहते हैं । आप को इस एक वाक्य के वैदिक मन्त्र में मानव जीवन का इतिहास छिपा मिलेगा । बात यह है कि मनुष्य अपने प्रारम्भिक जीवन की अवस्था में , आज जैसा व्यवस्थित नहीं था । उसे यहाँ तक पहुँचने में कितना समय लगा इसे तो कोई इतिहासकार ही बता पायेगा । लेकिन उस समय का जीवन व्यवस्थित नहीं होने के कारण भटकावपूर्ण था । वे यायावर थे । भटकते रहना ही जीवन की प्रथम कड़ी थी । घर किसे कहते हैं , वे जानते ही नहीं थे । वस्त्र के नाम पर वृक्षों की छाल , पत्ते , और पशुओं के चमड़े को ही लपेटे रहते थे । जिससे उन्हें ग्रीष्म और शिशिर दोनों ऋतुओं में बड़ी कठिनाई होती थी । वे इस मौसम के कारण प्रायः अल्पायु होते थे । इन मौसम में कष्ट उठाते हुए मृत्यु को प्राप्त हो जाते थे । वहीं शरद आने पर वे सुखी महसूस करते थे । हर्षित होते थे , यदि कोई अगले शरद तक बच जाता तो वे प्रसन्नता व्यक्त करते , इसी लिए आगे चल कर शरद के महात्म्य को लेकर यह वैदिक मन्त्र बना ।
