आस्था और प्रकृति का अद्भुत मिलन का पर्व है होली
चंदौली। परस्पर प्रेम,आपसी भाईचारा राग, रंग, हंसी, खुशी प्रतीक पर्व रंगोत्सव पूरे रंग में हैं। होलिका दहन दो दिन हो गया।कुछ स्थानों पर सोमवार की रात में होलिका दहन किया गया तो चंद्र ग्रहण के कारण आज भी होलिका दहन किया जाएगा। बुधवार को रंग अबीर उड़ाए जाएंगे।
चंदौली

4:57 PM, Mar 3, 2026
मनोहर कुमार
जनपद न्यूज़ टाइम्सश्रद्धा और प्रेम के साथ मनाया जाता है पर्व
चंदौली। परस्पर प्रेम,आपसी भाईचारा राग, रंग, हंसी, खुशी प्रतीक पर्व रंगोत्सव पूरे रंग में हैं। होलिका दहन दो दिन हो गया।कुछ स्थानों पर सोमवार की रात में होलिका दहन किया गया तो चंद्र ग्रहण के कारण आज भी होलिका दहन किया जाएगा। बुधवार को रंग अबीर उड़ाए जाएंगे।
होली को लेकर गांव हो या नगर चहुंओर जहां उल्लास का वातावरण बना हुआ है, वहीं रंग, अबीर, गुलाल संग विविध प्रकार के मुखौटे व पिचकारियों से सजी दुकानों पर खरीदारों की भीड़ देखते ही बन रही है। सोमवार को जिला मुख्यालय सहित पीडीडीयू नगर व जनपद के अन्य कस्बा बाजारों में लोग होली की खुशियां मनाने के लिए खरीदारी में जुटे रहे। देर शाम तक कपड़ों की दुकानों पर भी खरीदारों की भीड़ से बाजार गुलजार रहे। होली प्राचीन एवं वैज्ञानिक पर्व है। अन्य त्योहारों की तरह प्रकृति से भी संबंधित है। इससे भक्त प्रह्लाद व होलिका की कथा जुड़ी है। वहीं भगवान कृष्ण सनातन सिद्धांतों के अनुरूप पर्व आयोजन की प्रेरणा देते हैं। ऐसे में स्नेह व श्रद्धाभाव से होली मनाने का संकल्प लिया जाता है।
होली का नाम सुनते ही लोगों के चेहरों पर ओज चमकने लगता है। यह खुशी, उमंग तथा उत्साहवर्धन करने वाला पर्व है। ठंड के मौसम से सिकुड़ा हुआ शरीर होली की गर्माहट से स्फूर्ति का अनुभव करने लगता है। ऐसे में महिलाएं, पुरुष तथा बच्चे एक-दूसरे के चेहरों को रंग देते हैं। सरसों की पीले रंग की फसल देख लोग झूम उठते हैं। वहीं गेहूं की बालियांे पर सुनहरी तथा चने के होलों पर चढ़े हरे रंग से मन हर्षाता है।
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यह त्योहार सभ्यता के आरम्भ से मनाया जाता रहा है। पौराणिक साहित्य के अनुसार श्रीकृष्ण गोपियों संग होली खेलते, उन्हें रंग लगाते थे। परन्तु श्रीकृष्ण उच्छृंखल नहीं बल्कि सभ्य थे। सनातन वैदिक धर्म के अनुसार प्राचीन चार त्योहार सभी चारों वर्णों द्वारा मनाए जाते रहे हैं। इनमें श्रावणी पर्व (ब्राह्मण), आश्विन पर्व (क्षत्रिय), कार्तिक पर्व (वैश्य) तथा फाल्गुनी पर्व (शुद्र अर्थात् अशिक्षित) वर्ण को समर्पित रहे हैं। आज की कथित जातियों से इनका कोई संबंध नहीं।
इस पर्व को भक्त प्रह्लाद, उनकी बुआ होलिका तथा पिता हिरण्यकशिपु से भी जोड़ कर देखा जाता है। परन्तु भारतीय संस्कृति में सभी त्योहारों को प्रकृति के साथ जोड़ा गया है। होली के रंगों का शरीर, मन और बुद्धि पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। सरसों, पलाश, अमलताश, नीम, हल्दी इत्यादि से प्राकृतिक रंग तैयार किये जाते हैं। ये रंग, त्वचा के छिद्रों का शोधन कर संक्रामक रोगों से बचाते हैं। रंगों से खेलने, नृत्य तथा संगीत से मनुष्य में सकारात्मक तरंगें फैलती हैं। आजकल ऋतु परिवर्तन के दौरान हानिकारक जीवाणु अधिक हो जाते हैं। इसलिए गोबर के उपलों, आम की लकडि़यों, देसी घी तथा सूखे मेवों का प्रयोग होली दहन में होता है। इससे बैक्टीरिया नष्ट होकर पर्यावरण शुद्ध होता है।
